Sahitya Unnayan Sangha https://www.sahityaunnayansangha.org Sun, 22 Mar 2026 11:35:52 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://www.sahityaunnayansangha.org/wp-content/uploads/2026/03/cropped-site_icon_512-32x32.png Sahitya Unnayan Sangha https://www.sahityaunnayansangha.org 32 32 उफ! वे चुनार के कठोर पत्थर हथौड़ा थामे मलिन कमजोर औरत। https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4/ https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4/#respond Thu, 20 Nov 2025 09:07:13 +0000 https://ghazipursamachar.com/?p=29034

(कविता)

              मलिन औरत 

उफ! वे चुनार के कठोर पत्थर
हथौड़ा थामे मलिन कमजोर औरत।
धू-धूकर जलती धूप भीषण पसीने की बौछार
पत्थर के हर टुकड़े जैसे हो अंगार। 
नृत्य करती सूरज की किरणें विषधर किसी नागन सी
झेल रही थी वह अबला बेबस बन अभागन सी।
धधक रही थी क्षुधा की ज्वाला उसको उसे बुझाना था
दुधमुँहे अपने लाल की खातिर छाती में दूध जमाना था।
चिंगारी उम्मीदों की पत्थरों में उसने जलायी थी
लोहा बनाकर स्वयं को वक़्त से आ टकराई थी। 
पत्थरों को नहीं वह मुश्किलों को तोड़ रही थी
ठंडे पड़े तवे के लिए वह चँद रोटियाँ जोड़ रही थी। 
जिद्द थी उसकी धरती को पसीने से नहलाने की
दो जून के अनाज उन चट्टानों पर उगाने की। 
दुनिया से दूर गुमसुम अपने आप में खोई थी
वक्त का हर चोट उसके आसुओं से धुली थी।
तन्हाई का कारवाँ और बारात थी परछाई की
फरेबी की धुन्ध में वह बिम्ब थी सच्चाई की।

  • दिलीप कुमार चौहान “बागी”

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(बेटी) कभी फूलमाला, कभी अग्नि ज्वाला कभी घर की लक्ष्मी कहाती हैं बेटी https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b0%e0%a4%b9/ https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b0%e0%a4%b9/#respond Thu, 20 Nov 2025 08:55:52 +0000 https://ghazipursamachar.com/?p=29030 (बेटी)
कभी फूलमाला, कभी अग्निज्वाला
कभी घर की लक्ष्मी कहाती हैं बेटी।
कभी रणचण्डी, कभी झाँसी वाली
कभी रण में तेगा चलाती  हैं बेटी।

कभी घर की मर्यादा ऊँचा उठाती
कभी बोझी नैय्या डुबाती हैं बेटी।
कभी बहन तो कभी माँ और पत्नी
हर रूप में श्रेष्ठ मानी जाती हैं बेटी।

बेटों के लोभियों से कोई तो पूछे
कोंख में ही क्यों मारी जाती हैं बेटी।
दहेज के लिए कहीं जलाई हैं जाती
फन्दों पर कहीं झुलाई जाती हैं बेटी।

नीच दानव बना है मानव आजकल
सरेआम यहाँ नोची जाती हैं बेटी।
कभी निर्भया, कभी प्रियंका बनाकर
हवस की शिकार की जाती हैं बेटी।
– डॉ. दिलीप कुमार चौहान “बागी”

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गीत पिक के, काक के काँव – काँव बट वृक्ष के छाँव, सरसों के पीत पुलकित पुष्प https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be/ https://www.sahityaunnayansangha.org/%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be/#respond Wed, 19 Nov 2025 17:31:47 +0000 https://ghazipursamachar.com/?p=29025 ( मेरा गाँव)

गीत पिक के, काक के काँव – काँव
बट वृक्ष के छाँव,
सरसों के पीत पुलकित पुष्प
सरिता में विहसित नाव।

खेतों में बैलों की जोड़ी
मुस्काते खेत – खलिहान,
चारो पहर हो व्याकुल
खड़े स्वागत को सिवान।

नागपंचमी के दंगल – कुश्ती
दशहरा के वे मेले,
कठघोड़े, चरखा – चरखी
लट्टू –  जलेबी – केले।

प्रातः का शीघ्र जागना
शाम की मस्त थकान,
निशा के कोमल बाहों में
रंगीन सपनों के उड़ान।

पटनी पर पड़े गुड़ – खटाई
कोठली के वे धान,
होली का फाग – जोगिरा
महुवे के रसपान।

थक चुका है मन का परिंदा
ढूंढ़ – ढूंढ़कर हर ठाँव ,
भग्न शहरों में सिमट चुका है
सुंदर – सा मेरा गाँव।

……… दिलीप कुमार चौहान “बागी”

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